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Monday, June 24, 2024
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एक प्रेरक पुंज है “अँगूठा बोलता है” खण्डकाव्य

डा. अलका वर्मा

खंडकाव्य वह काव्य होता है जिसमें एक कथा का सूत्र विभिन्न छंदों के माध्यम से जुड़ा रहता है। खंड काव्य के नायक का जीवन के व्यापक चित्रण के स्थान पर किसी क पक्ष , अंश अथवा रुप का चित्रण होता है। हिन्दी के प्रमुख खंडकाव्य मैथिलीशरण गुप्त का ‘जयद्थवध’, ‘पंचवटी’ तथा ‘नहुष’, सियाराम शरण गुप्त का ‘र्मौय विजय’, रामनरेश त्रिपाठी का ‘पाथिक’, निराला कृत ‘तुलसीदास’, प्रसाद कृत ‘प्रेम पाथिक’ प्रसिद्ध खंडकाव्य है। उसी श्रृखला में ध्रुव नारायण सिंह राई रचित “अँगूठा बोलता है” खंडकाव्य अप्रतिम, सरस, समृद्ध एवं शोषित दलितों का प्रतिनिधित्व करता एक अनुपम कृति है।
“अँगूठा बोलता है ” आज की युग की चेतना से प्रभावित है। कवि एकलव्य जैसा दलित, उपेक्षित निरीह व्यक्ति को अपने काव्य का विषय बनाना उनकी लेखनी की प्रखरता प्रवीणता हृदय की संवेदनशीलता को दर्शाती है। उन्हें वर्ण वैमन्स्यता पर क्षोभ है, कहते हैं जब प्रकृति भेद भाव नहीं रखती फिर हम मानव क्यों
प्राणदायिनी हवा हमेशा
सर्वसुलभ सब नासिका पास।
विगलित हो धरती की ममता
क्षीर सदृश बहती अनायास।

सहज प्राप्य हैं सूर्य-रश्मियाँ
शीतल स्वच्छ सब सरिता सलिल।
सुधा-सीकर बरसाती निशा
सबके हित ये तारे झिलमिल।
(प्रथम सर्ग)
नौ सर्ग में विभक्त यह खंडकाव्य की सारी लक्षणों से परिपूर्ण एक विलक्षण काव्य है। प्राकृतिक उपादानों–उपमानों द्वारा प्रकृति का मनोहारी परिवेश का वर्णन करते हुए समानता की बात करते हैं-
जब हुआ सृष्टि का सूर्योदय,
यहाँ जगत् में कहीं नहीं था
वर्ण-भेद का कलुषित विचार,
वर्ग – वैषम्य – बोध अन्यथा।
(प्रथम सर्ग)
द्रोण अपने व्यवहार से खिन्न थे। वे द्रुपद से बदला लेने को कृत संकल्पित थे। ऐसी अवस्था में हस्तिनापुर का गुरुपद पाकर धन्य हुए, वे उन राजपुत्रों में सर्वक्षेष्ठ ढूढ़ रहे जो अपमान की अग्नि से झुलसे हुए हृदय को ठंडक प्रदान कर सके। एकलव्य जब शिक्षा की भिक्षा के लिए द्रोण के पास पहुँचा। शिक्षा उस समय सवर्णों की बपौती थी। शूद्रों को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार ही नहीं था। दानवीर कर्ण जैसे महायोद्धा को भी इस दंश को झेलना पड़ा था। छद्म नाम से शिक्षा ग्रहण किए थे, जिस कारण शापित होना पड़ा था। सवर्ण इस अधिकार को क्यों शूद्र को देना चाहेगा। एकलव्य के अनुरोध को गुरु के क्रोध का सामना करना पड़ा
अपावन बना दी है तुमने
आज मेरे आश्रम की ठाँव।
अब लौट जाओ तुम यहाँ से
अछूत, अविलंब उलटे पाँव।

नहीं तो खींच लूँगा अवश्य
ज़बानदराज़, जिह्वा तेरी।
औ’ उधेड़़ दूँगा निश्चित ही
अधम, अस्पृश्य चमड़़ी तेरी।
(तृतीय सर्ग)
जबकि वह विनती के साथ गुरु से अनुनय करता है। कवि के शब्दों में –
नहीं समुचित गुरुवर यह कोप
मैं तो विशुद्ध दया का पात्र।
बनकर सदाशय-उदारमना
बना लें मुझको अपना छात्र।

दें निज प्रेम-पीयूष प्रसाद
खोलें विद्या-द्वार अवरुद्ध।
तोड़़कर प्राचीन परम्परा
बनाएँ शूद्र को भी सुबुद्ध।
(तृतीय सर्ग)
जब वन भ्रमण के क्रम में कुत्ते के मुख को बाणों से विद्ध देखा तो चकित हो धर्नुधर का परिचय पूछते हैं। तब एकलव्य सरल शब्दों में अपना परिचय देता है-
जन्म से हीन; किंतु कर्म से
कोशिश कर मैं बन सका सबल।
करता हूँ शस्त्राभ्यास यहाँ
नाम जापकर गुरु का निर्मल।

चाहता केवल दलितोद्धार
नहीं निहित कुछ उद्देश्य अथच।
लक्ष्य मात्र करूँ धराशायी
रुढ़़ परम्परा को, भेद कवच।
(चतुर्थ सर्ग)
एकलव्य गुरुदक्षिणा देकर भी अविचल खड़ा रहा। कवि के शब्दों में-
खड़़ा रहा एकलव्य अविचल
ज्यों बड़ा शूरमा अलबेला।
लगी प्रतिमा अपरिचित उसको
जैसे कोई बेजान शिला।
(पंचम सर्ग)
जबकि प्रकृति का कण-कण सिहर उठा था, कवि के शब्दों में-
प्रकृति सिहरी, सिहरा संसार
दस दिशाएँ सब उठीं पुकार।
हा ! त्राहि-त्राहि! मची गगन में,
गुंजा वन में आर्त्त चित्कार।
(पंचम सर्ग)
एकलव्य दीन दलित का प्रतिनिधित्व करता है। अँगूठा गवाने के पश्चात् माता-पिता के इस कथन –
मैं कहता था–वत्स, व्यर्थ यूँ
उसके हित कोशिश करते हो,
मर मिटोगे किंतु न मिलेगा
नाहक ऐसी ज़िद करते हो।
(सप्तम सर्ग)
के जबाब में गर्वोक्ति-
नहीं पिताजी, नहीं मिलेगा
कभी भी शूद्रों को अधिकार।
नहीं मिटेगा, नहीं मिटेगा
दीपक जले बिना अंधकार।

ब्राह्मणों ने निज स्वार्थ निमित्त
कठोर निषेध-नियम बनाया।
क्षत्रिय ने निज बल-वैभव से
धरती पर इसको फैलाया।
(सप्तम सर्ग)
एकलव्य निराश नहीं होकर कर्म को धर्म मानता है। क्रांति का संदेश देता है। निराश न होने की प्रेरणा भी देता है। कवि के शब्दों में-
शूद्र होने का मुझको गर्व
मैं नहीं कम किसी सवर्ण से।
सदा विचार बड़़ा रखता हूँ
कुछ फ़र्क़ न पड़़ता अवर्ण से।
(अष्टम सर्ग)
साथ ही एकलव्य शूद्रों को जगाना चाहता है।
जगाना नहीं है उकसाना,
मैं सुसुप्तों को जगाता हूँ।
शूद्र जबतक सोया रहेगा
हीन रहेगा समझाता हूँ।
(अष्टम सर्ग)
कवि एकलव्य के माध्यम से युवकों को प्रेरणा देता है-
चलनेवाला पाता मंजिल
चढ़़ जाता सर्वोच्च सोपान।
अवर्ण हो अथवा हो सवर्ण
संरक्षित करता स्वाभिमान।
(अष्टम सर्ग)
गुरु द्रोण अँगूठा दान में ले तो लेते हैं किन्तु अन्दर तक हिल जाते हैं कवि एक नवीन प्रसंग को अपने काव्य में स्थान देकर गुरु द्रोण के प्रति मानवीय संवेदना व्यक्त करते हैं। तदापि एकलव्य अँगूठा देकर उच्च स्थान प्राप्त कर लेता है किन्तु गुरु द्रोण अपनी ही नजर में गिर जाता है। गुरु पद पर जन-जन को अँगूली उठाने पर वाध्य कर देता है, गुरु की महिमा धूमिल हो जाती है। फिर भी एकलव्य यह नहीं कहता नफरत करो कहता अपनी सोच में आफतब लाओ
नफ़रत से नफ़रत बढ़़ती है
पहले इसकी चिता जलाओ।
किसने तुमको रक्खा वंचित
इस विचार को मत धधकाओ।

यह सच बात है कि लड़़कर ही
केवल, ना आता इन्कि़लाब।
इसके लिए ज़रूरी जगना
उगाना सोच का आफ़ताब।
(अष्टम सर्ग)
कवि ने धर्म की परिभाषा बहुत ही सुन्दर ढ़ंग से परिभाषित किया है। वे सुकर्म को ही श्रेष्ट धर्म मानते हैं। अगर पतित को हाथ का सहारा देकर उठाते हैं, उसके प्रति मन में स्नेह भाव रखते हैं वह मनुष्य ही श्रेष्ठ कहलाता है। कवि के शब्दों में-
धर्म—प्राणीमात्र की सेवा,
रखना अतुलित स्नेह हृदय में;
करना कर्म सदैव महत्तर
और सुजन-सत्कार निलय में।

कर न्योछावर निज जीवन भी
बनाना पतित को भी उत्तम।
यही सुकर्म, यही श्रेष्ठ धर्म
सदा संसार में सुंदरतम।
(प्रथम सर्ग)
तथा इसके साथ धर्म कर्म का समायोजन कर कहता है-
धर्म वह जो इंसाँ बनाता,
सुकर्म बनाता सुभट बलवान्।
समझ बनाती सबको सक्षम
आत्मविश्वास बनाता महान्।

जगाओ आत्मविश्वास अटल
यदि तुमको ऊपर उठना है;
अंतर में प्रज्वालो ज्वाला
वर्णाश्रम ज़ीना चढ़़ना है।

प्रयत्न कर ही चढ़ता मानव
जीवन में उत्कर्ष-सोपान।
जो बैठा रहता अकर्मण्य
उसे पददलित करता जहान।

यह खंडकाव्य ध्रुव नारायण सिंह राई की रचना ‘अँगूठा बोलता है’ साहित्यकाश में ध्रुव तारा समान स्थिर और चमकता रहेगा, भटके हुए समाज को रास्ता दिखाता रहेगा।
कवि के शब्दों में-
नाम से कुछ काम ना होता
सुकाम बड़ा होना चाहिए।
मनुज सवर्ण हो अथवा शूद्र
विचार खरा होना चाहिए।
(सर्ग अष्टम)
यह खंडकाव्य जन जन के आँखों पर असमानता का पड़ा पर्दा हटाने के लिए काफी है, यह इंकलाब की आवाज उठाने वाला क्रांति मंत्र है। हम अपने स्थिति पर रोए नहीं बल्कि आगे बढ़ने का रास्ता बनाए। अतः यह एक प्रेरक खंडकाव्य है।
फिर अष्टम सर्ग में कवि एकलव्य एकालाप माध्यम से कहता है शूद्र को भी समान अधिकार मिलना चाहिए। वह सवर्णों से कम नहीं। दलित को सामान अधिकार देने के पक्ष में कवि का प्रयास प्रशंसनीय, प्रेरणादायक और अनुकरणीय है । जिसे कवि शब्दों में-
अतः मैं कहता—करो यक़ीन
शूद्र न कभी सवर्णों से कम।
समझो, संचेतो, ऐ शूद्रो!
करो सोत्साह सुकर्म हरदम।
(सर्ग अष्टम)
नारी सशक्तिकरण को कवि आवश्यक समझता है। कवि कवि शब्द में-
पर युवकों का हाथ चाहिए ,
आवश्यक युवतियों का साथ।
नारी सशक्तिकरण बिना, हम
कभी नहीं हो सकते सनाथ।
(सर्ग अष्टम)
अँगूठा बोलता है एक सोद्देश्यपूर्ण, शोषितों का प्रतिनिधित्व करता काव्य है, एकलव्य के माध्यम से
वे सामंतवादी व्यवस्था का धृणित रुप सबके समक्ष रखते है। इस काव्य की विलक्षण प्रतिभा उभर कर खंडकाव्य की उत्तेजक उत्पीड़क शक्ति हमारे मन को झकझोर देती है साथ ही कवि शब्द धारा प्रेरणा बन एक नया शक्ति संचार करती है। प्राचीन युग की क्या कहा जाय आज भी हम कुत्सित मानसिकता से उबर नहीं पाए हैं, उबरना होगा, जन-जन में क्रांति की मशाल जलानी होगी, तभी राष्ट्रीय एकता की बात कर सकेंगे। इस खण्ड काव्य में जमीनी हकीकत की बयानी है और जुल्मों सितम से लड़ने की प्रेरणा भी।
कविवर ध्रुव नारायण सिंह राई साहित्यकाश का ध्रुव तारा हैं तथा उनकी यह अमर कृति युग-युग तक जन-जन के दिलों में अपना स्थान कायम करेगी। यह विश्वास है “अँगूठा बोलता है” कवि के नाम सदृश ही साहित्याकाश में चमकता रहेगा।

 

पुस्तक का नाम- “अँगूठा बोलता है” खण्डकाव्य
रचनाकार का नाम- श्री ध्रुव नारायण सिंह राई
प्रथम संस्करण- 1997 माधविका प्रकाशन
द्वितीय संस्करण- 2022 स्वराज प्रकाशन,
दरियागंज, दिल्ली
मूल्य- 175/-
समीक्षक डा. अलका वर्मा
त्रिवेणीगंज, जिला- सुपौल,
बिहार, 852139
मो. — 7631307900

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